विवेक कुमार यादव । ब्युरो । बिहार/झारखंड ।
बाबू जगजीवन राम संसदीय अध्ययन एवं राजनीतिक शोध संस्थान के सहयोग से आयोजित कार्यक्रम में लेखिका गीता सिंह को सराहना, लोकगीतों को सहेजने की दिशा में ऐतिहासिक पहल ।
पटना:
बिहार की लोकसंस्कृति और पारंपरिक गीतों को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए ‘पारंपरिक लोकगीत’ नामक पुस्तक का लोकार्पण आज 1 जून को संध्या 4 बजे पटना में आयोजित एक गरिमामयी कार्यक्रम में संपन्न हुआ। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य बज्जिका भाषा में लोकगीतों की लुप्त होती परंपरा को सहेजना और अगली पीढ़ी तक पहुंचाना था।
कार्यक्रम का आयोजन बाबू जगजीवन राम संसदीय अध्ययन एवं राजनीतिक शोध संस्थान के सहयोग से किया गया, जिसमें बतौर मुख्य अतिथि पद्मभूषण डॉ. सी. पी. ठाकुर उपस्थित थे। कार्यक्रम की शुरुआत आकाशवाणी विविध भारती दिल्ली की उद्घोषिका सारिका पंकज के संचालन से हुई।

पुस्तक की लेखिका एवं लोकगायिका श्रीमती गीता सिंह ने पारंपरिक स्वागत गीत और झूमर नृत्य से कार्यक्रम का आरंभ कर सभी को लोक संस्कृति के मूल भाव से जोड़ दिया।
डॉ. सी. पी. ठाकुर ने अपने वक्तव्य में बज्जिका भाषा और लोकगीतों की महत्ता पर जोर देते हुए कहा कि “व्यक्ति भले ही कितनी भी आधुनिकता में डूबा हो, लेकिन पारंपरिक गीतों के बिना उसके निजी उत्सव अधूरे हैं। इन्हें संचित करना अत्यंत आवश्यक है।”
बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ. अनिल सुलभ ने लेखिका को बधाई देते हुए कहा कि लोकगीतों में संस्कृति का वास्तविक प्रतिबिंब होता है। ये गीत न केवल साहित्य की जड़ें हैं, बल्कि समाज की आत्मा हैं।
संस्थान के निदेशक डॉ. नरेंद्र पाठक ने लोकगीतों पर और अधिक कार्य करने की आवश्यकता जताई और युवा पीढ़ी से इस धरोहर को संभालने का आग्रह किया।
मैथिली अकादमी के सदस्य श्री हृदय नारायण झा, लोकगायक श्री मनोरंजन ओझा, और दीपक ठाकुर ने भी अपने विचार साझा करते हुए कहा कि बज्जिका जैसी भाषाओं में लिखी गई साहित्यिक कृतियाँ दुर्लभ होती जा रही हैं और यह पुस्तक एक अमूल्य धरोहर साबित होगी।
पुस्तक की संकलनकर्ता और लेखिका श्रीमती गीता सिंह ने कहा कि यह प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिए है ताकि हमारे संस्कार, गीत और संस्कृति समाज से विलुप्त न हों। यह केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण की ओर संकेत है।








